42 साल की लंबी अवधि के लिए लीज पर देने का टेंडर जारी
लखनऊ|उत्तर प्रदेश सरकार छह लघु जल विद्युत परियोजनाओं को 42 वर्ष के लिए निजी क्षेत्र को लीज पर देने की तैयारी में है। इसके लिए उत्तर प्रदेश राज्य विद्युत उत्पादन निगम ने टेंडर जारी कर दिया है। टेंडर के अनुसार 1.5 करोड़ रुपये प्रति मेगावाट के अग्रिम प्रीमियम पर निजी कंपनियों को परियोजनाएं सौंपी जाएंगी और वे 42 वर्षों तक उनका संचालन करेंगी।प्रदेश में 300 मेगावाट की रिहंद, 99 मेगावाट की ओबरा, 72 मेगावाट की माताटीला (ललितपुर) और 72 मेगावाट की खारा जल विद्युत परियोजनाएं पहले से संचालित हैं। इसके अतिरिक्त छह लघु जल विद्युत परियोजनाएं भी हैं, जिनके पास करोड़ों रुपये मूल्य की जमीन और अन्य संपत्तियां हैं। लीज पर प्रस्तावित परियोजनाओं में भोला (2.7 मेगावाट), सलावा (3 मेगावाट), निर्गजनी (5 मेगावाट), चित्तौरा (3 मेगावाट), पलरा (0.6 मेगावाट) और सुमेरा (1.5 मेगावाट) शामिल हैं। ये सभी अपर गंगा नहर पर स्थित लगभग 90 से 97 वर्ष पुरानी परियोजनाएं हैं।वहीं, टेंडर जारी होते ही ऊर्जा क्षेत्र से जुड़े संगठनों ने इसका विरोध शुरू कर दिया है। उनका कहना है कि परियोजनाएं राज्य सरकार के अधीन ही रहनी चाहिए, क्योंकि निजी कंपनियों की नजर इनके साथ जुड़ी बेशकीमती जमीन और संपत्तियों पर भी है। संगठनों ने मुख्यमंत्री से मामले में हस्तक्षेप की मांग की है।
टेंडर निरस्त होने तक आंदोलन जारी रहेगा- एआईपीईएफ
ऑल इंडिया पॉवर इंजीनियर्स फेडेरेशन के अध्यक्ष शैलेंद्र दुबे ने छह लघु जल विद्युत परियोजनाओं को 42 वर्षों के लिए निजी कंपनियों को लीज पर देने के निर्णय का विरोध किया है। उन्होंने कहा कि अपर गंगा नहर में वर्षभर पानी उपलब्ध रहता है, जिससे इन परियोजनाओं में लगातार बिजली उत्पादन संभव है। सीमित निवेश से इनके पुनरुद्धार और आधुनिकीकरण का खर्च एक वर्ष में निकाला जा सकता है। उन्होंने आरोप लगाया कि टेंडर में स्थापित क्षमता 15.5 मेगावाट के बजाय 6.3 मेगावाट दर्शाई गई और संपत्तियों का मूल्य कम आंका गया है। उन्होंने टेंडर निरस्त होने तक आंदोलन जारी रखने की चेतावनी दी है।
आरक्षण खत्म करने की साजिश- पावर ऑफिसर्स एसोसिएशन
पॉवर ऑफिसर्स एसोसिएशन के अध्यक्ष आरपी केन और कार्यवाहक अध्यक्ष अवधेश कुमार वर्मा ने आरोप लगाया कि लघु जल विद्युत परियोजनाओं को लीज पर देना निजीकरण की नई रणनीति है। उनका कहना है कि इससे कर्मचारियों की छंटनी होगी और आरक्षण व्यवस्था प्रभावित हो सकती है। निजी कंपनियां अपनी शर्तों पर नियुक्तियां करेंगी तथा सरकारी संपत्तियों के दुरुपयोग की आशंका है। उन्होंने मुख्यमंत्री से टेंडर निरस्त कर संबंधित अधिकारियों के खिलाफ कार्रवाई की मांग की है।

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