गंगा दशहरा पर गंगा पूजन का है विशेष महत्व
गंगा दशहरा इस बार 25 मई को है। सनातन धर्म में इसका बेहद महत्व है। धार्मिक मान्यता के अनुसार राजा भगीरथ ने अपने पुरखों को मुक्ति प्रदान करने के लिए भगवान शिव की आराधना करके गंगा जी को स्वर्ग से उतारा था। जिस दिन वे गंगा को इस धरती पर लाए, वही दिन गंगा दशहरा के नाम से जाना जाता है। ज्येष्ठ शुक्ल दशमी को हस्त नक्षत्र में स्वर्ग से गंगा का आगमन हुआ था। अतः इस दिन गंगा आदि का स्नान, अन्न वस्त्र आदि का दान, जप तप, उपासना और उपवास किया जाता है। इससे पापों से छुटकारा मिलता है। इस दिन गंगा पूजन का विशेष महत्व है। महर्षि व्यास ने गंगा की महिमा के बारे में पद्म पुराण में लिखा है कि अविलंब सद्गति का उपाय सोचने वाले सभी स्त्री−पुरुषों के लिए गंगा ही ऐसा तीर्थ है, जिनके दर्शन भर से सारे पाप नष्ट हो जाते हैं। भविष्य पुराण में लिखा हुआ है कि जो मनुष्य इस दिन गंगा के पानी में खड़ा होकर दस बार गंगा स्तोत्र को पढ़ता है चाहे वो दरिद्र हो, चाहे असमर्थ हो वह भी गंगा की पूजा कर वांछित फल को पाता है।
इस पर्व पर मंदिरों को विशेष रूप से सजाया जाता है खासकर गंगा किनारे के मंदिरों की सजावट इस दिन देखते ही बनती है। लाखों की संख्या में श्रद्धालु गंगा में डुबकी लगाते हैं और पवित्र नदी का पूजन करते हैं। इस पर्व की छटा उत्तर भारत में विशेष रूप से संपूर्ण उत्तर प्रदेश, उत्तराखंड, बिहार में अलग ही रूप में देखने को मिलती है। यहां गंगा अवसर के दिन मेले का आयोजन भी किया जाता है।
इस दिन गंगा तटवर्ती प्रदेश में अथवा सामर्थ्य न हो तो समीप के किसी भी जलाशय या घर के शुद्ध जल से स्नान करके स्वर्ण आदि के पात्र में त्रिनेत्र, चतुर्भुज, सर्वावय विभूषित, रत्न कुम्भधारिणी, श्वेत वस्त्रों से सुशोभित तथा वर और अभय मुद्रा से युक्त श्री गंगाजी की प्रशान्त मूर्ति अंकित करें अथवा किसी साक्षात मूर्ति के करीब बैठ जाएं और फिर ओम नमः शिवायै नारायण्यै दशहरायै गंगायै नमः से आह्वान आदि षोड्शोपचार पूजन करें। तत्पश्चात ओम नमो भगवते ऐं ह्रीं श्रीं हिलि, हिलि, मिली मिली गंगे मां पावय पावय स्वाहा मंत्र से पांच पुष्पांजलि अर्पण करके गंगा को पृथ्वी पर लाने वाले भगीरथ का और जहां से उनका उद्भव हुआ है, उस हिमालय का नाम मंत्र से पूजन करें। फिर दस फल, दस दीपक और दस सेर तिल का गंगायै नमः कहकर दान करें। साथ ही घी मिले हुए सत्तू और गुड़ के पिण्ड जल में डालें। सामर्थ्य हो तो सोने का कछुआ, मछली और मेढक आदि का भी पूजन करके जल में विसर्जित करें। इसके अतिरिक्त दस सेर तिल, दस सेर जौ और दस सेर गेहूं दस ब्राह्मणों को दान दें।


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