लेख: अकेली दिखती महिलाएँ और समाज की अधूरी समझ

समाज किसी महिला को समझने से पहले उसके माथे को देखता है।
अगर वहाँ बिंदी नहीं है, माँग में सिंदूर नहीं है, तो तुरंत निष्कर्ष निकाल लिया जाता है कि उसके जीवन में कुछ “अधूरा” है।
लेकिन क्या वास्तव में किसी स्त्री की पूरी पहचान इन चिन्हों पर टिकी होती है?

यह तस्वीर उस महिला की कहानी कहती है जो सादगी में बैठी है, किताब के पन्नों में झुकी हुई।
उसके जीवन में पति नहीं है — या है भी तो साथ नहीं।
लेकिन इसका अर्थ यह नहीं कि उसके जीवन में सोच नहीं है, उद्देश्य नहीं है या आत्मसम्मान नहीं है।

अकेलापन हमेशा मजबूरी नहीं होता।
कई बार यह परिस्थितियों से जन्म लेता है और कई बार सोच-समझकर चुना जाता है।
ऐसी महिलाओं के लिए किताबें केवल समय काटने का साधन नहीं होतीं, बल्कि आत्मसंवाद का माध्यम होती हैं।
वे पढ़ती हैं ताकि खुद को समझ सकें, अपने जीवन को नए अर्थ दे सकें।

समाज अक्सर उन महिलाओं पर सवाल उठाता है जो दिखावे से दूर रहती हैं।
जो न ज़्यादा बोलती हैं, न अपनी पीड़ा का प्रदर्शन करती हैं।
लेकिन यही महिलाएँ भीतर से सबसे ज़्यादा मजबूत होती हैं, क्योंकि उन्होंने सहारे के बिना जीना सीख लिया होता है।

यह लेख किसी एक महिला के बारे में नहीं है।
यह उन हज़ारों महिलाओं की आवाज़ है जो बिना सिंदूर, बिना बिंदी, बिना शोर के
अपना जीवन गरिमा और समझदारी के साथ जी रही हैं।
उन्हें दया नहीं चाहिए — उन्हें सिर्फ़ सम्मान चाहिए।