ओवैसी की एंट्री से गरमाई UP की सियासत, सपा-कांग्रेस के वोट बैंक पर नजर
लखनऊ। उत्तर प्रदेश विधानसभा चुनाव 2027 की बिसात अभी से बिछनी शुरू हो गई है। राज्य में आगामी चुनाव में अभी करीब सात महीने का समय शेष है, लेकिन एआईएमआईएम (AIMIM) प्रमुख असदुद्दीन ओवैसी ने अपनी राजनीतिक सक्रियता को काफी पहले ही धार दे दी है। ओवैसी ने पश्चिमी उत्तर प्रदेश को अपना मुख्य रणनीतिक केंद्र बनाते हुए ताबड़तोड़ रैलियों का सिलसिला शुरू कर दिया है। 15 जून को बहराइच से 'मिशन यूपी 2027' का आगाज करने के बाद से ओवैसी लगातार सहारनपुर और मुरादाबाद जैसे क्षेत्रों में जनसभाएं कर पार्टी के जनाधार को विस्तार देने में जुटे हैं।
पश्चिमी उत्तर प्रदेश का राजनीतिक समीकरण
ओवैसी की रणनीति के केंद्र में पश्चिमी उत्तर प्रदेश और रोहिलखंड का क्षेत्र है, जहां मुस्लिम और दलित आबादी का प्रभाव चुनाव परिणामों को बदलने की क्षमता रखता है। उदाहरण के तौर पर, बहराइच और सहारनपुर जैसे जिलों में मुस्लिम मतदाताओं की बड़ी हिस्सेदारी है, जो यहां की कई विधानसभा सीटों पर निर्णायक भूमिका निभाते हैं। ओवैसी का मुख्य लक्ष्य इसी 'मुस्लिम-दलित' गठजोड़ को अपने पक्ष में करने का है। इसके लिए पार्टी ने स्थानीय स्तर पर चेहरों को आगे लाकर संगठन को जमीनी स्तर पर मजबूत करना शुरू कर दिया है। पार्टी सूत्रों के अनुसार, करीब 200 विधानसभा सीटों पर संगठन को सक्रिय रूप से खड़ा करने की योजना है।
गठबंधन की संभावनाएं और पिछले अनुभव
गठबंधन को लेकर ओवैसी का रुख स्पष्ट है; वे भाजपा को चुनौती देने के लिए साथ आने को तैयार तो हैं, लेकिन 'सम्मान और बराबरी की हिस्सेदारी' की शर्त के साथ। इससे पहले 2022 में 'भागीदारी परिवर्तन मोर्चा' और 2024 के लोकसभा चुनाव में 'पीडीएम' (पिछड़ा-दलित-मुस्लिम) के प्रयोग से उन्होंने गठबंधन की राजनीति को आजमाया है। हालांकि, पूर्व के इन प्रयासों को चुनावी सफलता नहीं मिली, फिर भी एआईएमआईएम इस बार फिर से नए समीकरण तलाश रही है। ओवैसी का प्रयास यह है कि चुनाव से पहले सांगठनिक ताकत इतनी बढ़ा ली जाए कि किसी भी गठबंधन में पार्टी सौदेबाजी की मजबूत स्थिति में रहे।
विपक्षी दलों के लिए ओवैसी की चुनौती
उत्तर प्रदेश में अब तक एआईएमआईएम का चुनावी ट्रैक रिकॉर्ड बहुत प्रभावशाली नहीं रहा है, लेकिन राजनीतिक जानकारों का मानना है कि उनकी उपस्थिति सपा-कांग्रेस के पारंपरिक मुस्लिम वोट बैंक में बड़ी सेंध लगा सकती है। यदि ओवैसी अकेले भी चुनाव लड़ते हैं, तो पश्चिमी यूपी में उनका प्रभाव विपक्षी गठबंधन के समीकरणों को बिगाड़ने के लिए पर्याप्त है। ओवैसी का यह प्रयास सपा और कांग्रेस जैसे बड़े विपक्षी दलों के लिए एक बड़ी चुनौती बन सकता है। आने वाले समय में यह देखना दिलचस्प होगा कि ओवैसी की यह सांगठनिक मेहनत और गठबंधन की रणनीतियां 2027 के महासमर में राजनीतिक दिशा को किस हद तक बदल पाती हैं।

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