क्रूड सस्ता, लेकिन बारिश कमजोर! महंगाई और ग्रामीण मांग पर डबल असर
नई दिल्ली: भारतीय अर्थव्यवस्था (Indian Economy) को लेकर इस वक्त ग्लोबल और घरेलू मोर्चों से दो बिल्कुल अलग और चौंकाने वाले संकेत मिल रहे हैं। एक तरफ जहां अंतरराष्ट्रीय घटनाक्रमों से देश के लिए बड़ी राहत की खबर आ रही है, वहीं दूसरी तरफ घरेलू मौसम वैज्ञानिकों और अर्थशास्त्रियों की चिंताएं बढ़ गई हैं।
पश्चिम एशिया में हुए शांति समझौते के बाद अंतरराष्ट्रीय बाजार में कच्चे तेल (Crude Oil) की कीमतों में भारी गिरावट दर्ज की जा रही है। भारत जैसे बड़े तेल आयातक देश के लिए यह किसी वरदान से कम नहीं है, जिसे देखते हुए तमाम बड़ी वैश्विक ब्रोकरेज फर्म्स ने भारत की विकास दर (GDP Growth Rate) के अनुमान को बढ़ा दिया है। लेकिन इसके ठीक उलट, घरेलू मोर्चे पर 'अल नीनो' (El Niño) के असर और सुस्त मानसून ने देश के नीति-निर्माताओं की सांसें अटका दी हैं।
वैश्विक एजेंसियों को भारतीय बाजार पर भरोसा: जीडीपी अनुमान में बढ़ोतरी
वैश्विक निवेश बैंक गोल्डमैन सैक्स (Goldman Sachs) ने भारत के आर्थिक प्रदर्शन को देखते हुए वित्त वर्ष 2026-27 के लिए देश का विकास अनुमान 6.1 फीसदी से बढ़ाकर 6.5 फीसदी कर दिया है।
बैंक का मानना है कि चालू तिमाही में भारत की जीडीपी उम्मीद से कहीं बेहतर रफ्तार से आगे बढ़ रही है। कच्चे तेल के दामों में आई कमी का सीधा और बड़ा फायदा भारतीय सरकारी खजाने और आम जनता को मिलेगा।
इसके साथ ही जानी-मानी एजेंसी ईवाई (EY) ने भी मौजूदा वित्त वर्ष में भारत की रियल जीडीपी ग्रोथ रेट 6.6% से 6.8% के बीच रहने का अनुमान जताया है। ईवाई के मुताबिक, भारत का मैन्युफैक्चरिंग (विनिर्माण) और सर्विस सेक्टर (सेवा क्षेत्र) इतना मजबूत है कि देश किसी भी बाहरी वैश्विक संकट या अनिश्चितता का सामना आसानी से कर लेगा।
घरेलू मोर्चे पर मानसून का खतरा: 300 अरब डॉलर की ग्रामीण अर्थव्यवस्था दांव पर
जहां एक तरफ विदेशी एजेंसियां भारत के मजबूत इंफ्रास्ट्रक्चर और पेट्रोलियम रिफाइनिंग क्षमता को देखकर गदगद हैं, वहीं दूसरी तरफ कृषि और ग्रामीण मामलों के विशेषज्ञ जमीनी हकीकत को लेकर चेतावनी दे रहे हैं।
भारत की लगभग 300 अरब डॉलर की विशाल कृषि अर्थव्यवस्था और ग्रामीण इलाकों की पूरी डिमांड पूरी तरह से दक्षिण-पश्चिम मानसून (South-West Monsoon) की बारिश पर टिकी हुई है। अगर अल नीनो के कारण इस बार बारिश कमजोर रहती है, तो इसका सीधा असर देश के गांवों और किसानों की जेब पर पड़ेगा।
| अर्थशास्त्री/संस्था | मुख्य चिंता और असर |
| रजनी ठाकुर (अर्थशास्त्री, एलएंडटी फाइनेंस) | कम बारिश से ग्रामीण इलाकों में सेंटीमेंट खराब होता है। इसका सीधा असर त्योहारी सीजन (Festive Season) के दौरान गांवों में होने वाली खरीदारी और शेयर बाजार पर देखने को मिल सकता है। |
| युविका सिंघल (क्वांटइको रिसर्च) | मानसून की बारिश में महज 10 फीसदी की कमी भी देश में उपभोक्ता महंगाई (Consumer Inflation) को 1 फीसदी तक बढ़ा सकती है, जिससे खाने-पीने की चीजें महंगी हो सकती हैं। |
साफ है कि भारतीय अर्थव्यवस्था इस समय एक दोराहे पर खड़ी है। अब देखना यह होगा कि कच्चे तेल की गिरावट से मिलने वाली राहत, मानसून की इस सुस्ती और अल नीनो के आर्थिक झटकों को कितना संभाल पाती है।

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