गंगा दशहरा कब? हर की पौड़ी पर स्नान से खत्म हो जाते हैं जन्म मरण के बंधन
वैदिक पंचांग के अनुसार एक संवत में कुछ खास तिथियों का आगमन होता है. खास तिथियों में मोक्ष प्राप्त करने के लिए किए गए धार्मिक कार्यों का संपूर्ण फल प्राप्त होने की धार्मिक मान्यता है. एक संवत में 12 अमावस्याएं, 12 पूर्णिमा, एकादशी, प्रदोष, गंगा सप्तमी, गंगा दशहरा आदि कई शुभ तिथियों का आगमन होता है. इन खास तिथियां पर यदि कोई भी धार्मिक कार्य या धार्मिक अनुष्ठान श्रद्धा पूर्वक किया जाए तो उस पर्व का विशेष फल प्राप्त होता है. ज्येष्ठ माह में होने वाले गंगा दशहरे का पर्व हिंदू धर्म के लोग बड़े उत्साह के साथ मनाते हैं. संवत 2083 में ज्येष्ठ मास में अधिक मास का आगमन हुआ था, जिस कारण अधिक मास के शुक्ल पक्ष में गंगा दशहरे पर्व का आगमन पंचांग के अनुसार हुआ था, लेकिन ज्येष्ठ शुद्ध शुक्ल पक्ष में भी दशमी तिथि का आगमन होगा.
करना क्या होगा
पंचांग की गणना के अनुसार, ज्येष्ठ शुद्ध शुक्ल पक्ष की दशमी तिथि को गंगा स्नान का महत्व बताया गया है. इसकी ज्यादा जानकारी करने के लिए हमने शास्त्रों की जानकार पंडित श्रीधर शास्त्री से बातचीत की. उन्होंने कहा कि ज्येष्ठ शुक्ल पक्ष की दशमी तिथि को गंगा दशहरे का पर्व मनाया जाता है, लेकिन ज्येष्ठ माह में अधिक मास आने से गंगा दशहरे का पर्व 26 मई को मनाया गया था. ज्येष्ठ शुद्ध शुक्ल पक्ष की दशमी तिथि का आगमन 24 जून की सुबह 9:37 बजे से शुरू होगा जो 25 जून की सुबह 8:46 तक रहेगा. ज्योतिष शास्त्र के अनुसार हिंदू धर्म में किसी भी पर्व का सबसे अधिक फल उसकी उदया तिथि में मिलता है. 24 जून को दशमी तिथि सूर्य निकलने के बाद शुरू होगी जबकि 25 जून में सूर्य का उदय दशमी तिथि में होने के कारण गंगा स्नान का संपूर्ण फल प्राप्त होगा.
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10 सुखों की प्राप्ति
पंडित श्रीधर शास्त्री बताते हैं कि दशमी तिथि का आगमन भले ही 24 जून सुबह 9:37 से होगा, लेकिन इसका संपूर्ण फल 25 जून को गंगा स्नान करने से ही मिलेगा. ज्येष्ठ शुद्ध शुक्ल पक्ष में दशमी तिथि को हरिद्वार हर की पौड़ी के ब्रह्म कुंड घाट, मालवीय घाट, सुभाष घाट, अस्थि घाट, कुशा घाट, नील धारा यानी नील घाट पर 25 जून को ब्रह्म मुहूर्त से लेकर पूरे दिन स्नान करने पर गंगा दशहरे के समान ही 10 सुखों की प्राप्ति होगी. वह आगे बताते हैं कि गंगा स्नान करना हो या गंगा के विशेष घाटों पर पूजा आराधना, जाप आदि का सबसे अधिक महत्व धर्म नगरी हरिद्वार में है. गंगा गोमुख से निकलकर पहाड़ों से होते हुए समतल क्षेत्र हरिद्वार में सबसे पहले प्रवेश करती है. हर की पौड़ी पर ब्रह्मा की तपस्थली होने और अमृत की बूंदें छलक कर गिरने के कारण हरिद्वार में गंगा का महत्व सबसे अधिक होता है.

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