सिर्फ 10 दिन का सहारा! कच्चे तेल के भंडार को लेकर क्यों बढ़ी चिंता?
नई दिल्ली। भारत की ऊर्जा सुरक्षा को लेकर एक महत्वपूर्ण रिपोर्ट सामने आई है, जिसके अनुसार देश का रणनीतिक पेट्रोलियम रिजर्व (एसपीआर) संकट की स्थिति में केवल 9 से 10 दिनों की कच्चे तेल की आवश्यकता को पूरा करने में सक्षम है। काउंसिल ऑन एनर्जी, एनवायरनमेंट एंड वॉटर (सीईईडब्ल्यू) की ओर से जारी इस अध्ययन में बताया गया है कि पेट्रोलियम उत्पादों के आयात पर भारी निर्भरता होने के बावजूद भारत की भंडारण क्षमता जापान और दक्षिण कोरिया जैसे विकसित राष्ट्रों की तुलना में बेहद सीमित है। इन देशों के पास अपनी आवश्यकता के अनुसार 200 से अधिक दिनों का बैकअप स्टॉक मौजूद रहता है, जो उन्हें किसी भी वैश्विक संकट से निपटने में मजबूती प्रदान करता है।
आयात पर निर्भरता और संभावित आर्थिक खतरे
विश्लेषण के मुताबिक, भारत अपनी जरूरत का 85 प्रतिशत से ज्यादा कच्चा तेल मुख्य रूप से रूस और पश्चिम एशिया के महज छह देशों से खरीदता है। ऐसी स्थिति में अंतरराष्ट्रीय स्तर पर आपूर्ति श्रृंखला में कोई भी रुकावट आने पर देश का संकट प्रबंधन तंत्र कमजोर पड़ सकता है। चिंता की बात यह भी है कि देश में प्राकृतिक गैस के लिए कोई विशेष रणनीतिक भंडारण ढांचा नहीं है, जिससे सीधे तौर पर खाद कारखानों और शहरों की गैस वितरण प्रणालियों पर प्रतिकूल प्रभाव पड़ने का डर बना रहता है। विशेषज्ञों का मानना है कि कच्चे तेल, एलएनजी, एलपीजी या समुद्री परिवहन मार्गों में पैदा होने वाला कोई भी अवरोध देश में ईंधन की कीमतों, घरेलू रसोई गैस, उर्वरक सब्सिडी और आम महंगाई को सीधे प्रभावित कर सकता है।
भविष्य के संकट से बचने के लिए महत्वपूर्ण सुझाव
ऊर्जा सुरक्षा को सुदृढ़ करने के लिए इस अध्ययन में कई महत्वपूर्ण कदम उठाने की सलाह दी गई है। इसके तहत देश के भीतर जो गैस के कुएं अब खाली हो चुके हैं, उन्हें प्राकृतिक गैस के भंडारण केंद्रों के रूप में विकसित करने के काम में तेजी लाई जानी चाहिए। साथ ही, एक राष्ट्रीय रिफाइनरी परिवर्तन योजना को जमीनी स्तर पर लागू करने की आवश्यकता जताई गई है, ताकि भविष्य की अनिश्चितताओं से निपटा जा सके।
रिफाइनरी क्षमता के पुनर्संतुलन की आवश्यकता
साल 2030 के बाद बाजार में पेट्रोल और डीजल की मांग के बदलते स्वरूप को ध्यान में रखते हुए भारतीय रिफाइनरियों के मौजूदा बुनियादी ढांचे को नया रूप देने की सिफारिश की गई है। इसके अलावा, विदेशी बाजारों में भेजे जाने वाले डीजल के निर्यात को रोककर घरेलू जरूरतों की तरफ मोड़ने का विकल्प सुझाया गया है। रणनीतिकारों का यह भी कहना है कि वर्ष 2040 के बाद जो रिफाइनिंग क्षमताएं अनुपयोगी हो सकती हैं, उनमें अभी अतिरिक्त निवेश करने से बचा जाना चाहिए ताकि देश को आर्थिक नुकसान न उठाना पड़े।

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