15 दिन गैरहाजिर रहने का आरोप, सोशल मीडिया गतिविधियों से बढ़ा मामला
शहडोल: मध्य प्रदेश के शहडोल पुलिस महकमे के चर्चित प्रधान आरक्षक (यातायात) विवेकानंद तिवारी के निलंबन का मामला अब एक साधारण विभागीय कार्रवाई से कहीं आगे निकल चुका है। पुलिस अधीक्षक (SP) रामजी श्रीवास्तव द्वारा अनुशासनहीनता के आरोप में की गई इस कार्रवाई के बाद जहाँ एक तरफ पुलिस प्रशासन इसे सेवा नियमों के तहत सही ठहरा रहा है, वहीं दूसरी ओर सस्पेंडेड हेड कांस्टेबल सोशल मीडिया पर लगातार अपने पक्ष में दस्तावेज सार्वजनिक कर रहे हैं। इस खींचतान के बीच इंटरनेट पर तिवारी के समर्थकों और विरोधियों के बीच एक तीखी बहस छिड़ गई है।
प्रशासन का पक्ष: बिना बताए 15 दिन से गायब और रील बनाने का आरोप
पुलिस विभाग द्वारा जारी आधिकारिक बयान के मुताबिक, प्रधान आरक्षक विवेकानंद तिवारी पिछले 15 दिनों से बिना किसी सूचना या स्वीकृत अवकाश (लीव) के अपनी ड्यूटी से लगातार नदारद चल रहे थे।
विभाग का तर्क: पुलिस प्रशासन का आरोप है कि कर्तव्य से गायब रहने के दौरान वे विभिन्न स्थानों पर वीडियो (रील्स) बनाकर उन्हें इंस्टाग्राम और अन्य सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म पर निजी प्रचार व लाभ के उद्देश्य से अपलोड कर रहे थे। विभाग ने इसे पुलिस रेग्युलेशन के पैरा 64 के तहत सेवा शर्तों और अनुशासन का गंभीर उल्लंघन मानते हुए तत्काल प्रभाव से निलंबन की कार्रवाई की है।
प्रधान आरक्षक का दावा: 'मैं डिप्रेशन और मानसिक तनाव से जूझ रहा था'
निलंबन की कार्रवाई के बाद विवेकानंद तिवारी ने अपने सोशल मीडिया हैंडल से मेडिकल दस्तावेज साझा करते हुए विभाग के आरोपों पर अपना पक्ष रखा है:
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मानसिक स्वास्थ्य का हवाला: तिवारी का दावा है कि वे पिछले कई महीनों से मानसिक तनाव, अवसाद (डिप्रेशन), घबराहट और अनिद्रा (नींद न आना) जैसी गंभीर समस्याओं से जूझ रहे थे, जिसके लिए वे डॉक्टरी इलाज ले रहे थे।
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टीम पर डाला जिम्मा: उन्होंने स्पष्ट किया कि डॉक्टरों ने उन्हें पूरी तरह बेड रेस्ट की सलाह दी थी, जिसकी जानकारी उन्होंने विभागीय व्हाट्सएप ग्रुप पर भी साझा की थी। बीमारी के दौरान सोशल मीडिया पर पोस्ट हुए वीडियो उनके परिवार और टीम द्वारा अपलोड किए गए थे, न कि उन्होंने खुद किए।
सोशल मीडिया पर दोफाड़ हुए लोग: लोकप्रियता बड़ी या अनुशासन?
इस हाई-प्रोफाइल मामले के सामने आने के बाद जनता और नेटिजन्स की राय दो हिस्सों में बंट गई है:
| पक्ष | समर्थकों का तर्क |
| विवेकानंद तिवारी के समर्थक | उन्होंने शहडोल में अनोखे अंदाज में यातायात जागरूकता (Traffic Awareness) फैलाकर शहर को राष्ट्रीय स्तर पर पहचान दिलाई है। ऐसे में बीमारी के वक्त उनके साथ सहानुभूति बरती जानी चाहिए। |
| प्रशासन और अनुशासन समर्थक | कोई भी सरकारी कर्मचारी चाहे सोशल मीडिया पर कितना भी लोकप्रिय क्यों न हो, वह वर्दी और विभागीय अनुशासन (Departmental Discipline) से ऊपर नहीं हो सकता। |
एक निलंबन, जिसने खड़े किए कई बड़े सवाल
शहडोल का यह मामला अब सिर्फ एक पुलिसकर्मी के सस्पेंशन तक सीमित नहीं रहा। इसने सरकारी सेवा की मर्यादा, सोशल मीडिया की ताकत, व्यक्तिगत लोकप्रियता, कर्मचारियों के मानसिक स्वास्थ्य और विभागीय नियमों के बीच के संतुलन को लेकर एक बड़ी राष्ट्रीय बहस को जन्म दे दिया है। अब देखना बेहद दिलचस्प होगा कि विभागीय जांच के बाद ऊंट किस करवट बैठता है।

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