एक टोकाटाकी और बढ़ गई मुश्किल, दो बहनों के लापता होने से मचा हड़कंप
जबलपुर: संस्कारधानी जबलपुर के भेड़ाघाट थाना क्षेत्र के अंतर्गत आने वाले ग्राम छेड़ी बरौदा में एक संवेदनशील मामला सामने आया है। यहाँ स्मार्टफोन का बहुत ज्यादा इस्तेमाल करने पर एक पिता ने अपनी दो नाबालिग बेटियों को फटकार लगा दी। पिता की यह डांट दोनों किशोरियों को इतनी नागवार गुजरी कि वे बीते कल की शाम परिजनों को बिना कुछ बताए चुपचाप घर से निकल गईं। काफी समय बीत जाने के बाद भी जब दोनों लड़कियां घर नहीं लौटीं, तो परिवार वालों ने उनकी तलाश शुरू की, मगर आसपास कहीं भी उनका अता-पता नहीं चला। अनहोनी की आशंका से डरे परिजनों ने फौरन इसकी जानकारी भेड़ाघाट थाना पुलिस को दी। मामले की संवेदनशीलता को देखते हुए पुलिस ने तुरंत अपहरण व गुमशुदगी की धाराओं में केस दर्ज किया और बस डिपो, रेलवे स्टेशन तथा शहर के अन्य चौराहों पर रातभर सघन तलाशी अभियान चलाया। पुलिस की इस तत्परता का सुखद परिणाम यह रहा कि सुबह दोनों बहनें बमौरी गांव में अपने एक संबंधी के घर पर पूरी तरह सुरक्षित मिल गईं।
रातभर एक्टिव रही पुलिस, सुबह घर लौट आईं खुशियां
थाना प्रभारी और उनकी टीम ने जैसे ही बच्चियों के लापता होने की खबर सुनी, उन्होंने बिना एक पल गंवाए अलग-अलग टीमें बनाकर रेस्क्यू ऑपरेशन शुरू कर दिया था। रातभर चली इस खोजबीन के दौरान पुलिस लगातार पीड़ित परिवार के संपर्क में रही ताकि कोई भी इनपुट मिस न हो। सुबह जैसे ही तकनीकी सर्विलांस और मुखबिर तंत्र से दोनों लड़कियों के बमौरी गांव में होने की सूचना मिली, पुलिस टीम ने मौके पर पहुंचकर दोनों को अपनी कस्टडी में लिया। थाने लाकर आवश्यक कानूनी औपचारिकताएं पूरी करने के बाद पुलिस ने दोनों बेटियों को उनके माता-पिता के हवाले कर दिया, जिससे परेशान परिवार के चेहरे पर मुस्कान लौट आई।
काउंसिलिंग के बाद माता-पिता को मिली दोस्ताना व्यवहार करने की सीख
इस पूरे वाकये के शांतिपूर्ण समाधान के बाद पुलिस के वरिष्ठ अधिकारियों ने दोनों किशोरियों की मनोवैज्ञानिक काउंसिलिंग की। उन्हें समझाया गया कि गुस्से में आकर घर छोड़ना कितना खतरनाक साबित हो सकता है। इसके साथ ही, पुलिस ने बच्चियों के माता-पिता को भी अलग से समझाइश दी कि वे आज के इस डिजिटल युग में बच्चों पर अत्यधिक पाबंदियां लगाने या उन पर चिल्लाने के बजाय उनसे दोस्ताना व्यवहार करें। अधिकारियों ने कहा कि अभिभावकों को बच्चों के साथ खुलकर बातचीत (संवाद) करनी चाहिए और उनकी मानसिक स्थिति को समझना चाहिए, ताकि भविष्य में बच्चे आवेश में आकर ऐसा कोई कदम न उठाएं।

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