बिचौलियों के जरिए पहले से तय होता था कमीशन
लखनऊ |10 लाख की रिश्वतखोरी के मामले में लखनऊ में सीबीआई की तफ्तीश में बड़ा खुलासा हुआ है। वाटर एंड पावर कंसल्टेंसी सर्विसेज लिमिटेड (वापकोस) के आरोपी अफसर टेंडर की गोपनीय जानकारी व दस्तावेज बिचौलिये को देते थे। बिचौलिओं के जरिये डील होने के बाद ये अहम जानकारी ठेका लेने वाली कंपनियों को दी जाती थी। इसके बाद टेंडर प्रक्रिया में सिर्फ औपचारिकता होती थी।सीबीआई ने शनिवार को वापकोस के प्रोजेक्टर मैनेजर पंकज दुबे, इकाना इंटरप्राइज के प्रोपराइटर बबलू सिंह यादव, बिचौलिये राहुल वर्मा व बबलू के अलावा पंकज के ड्राइवर शुभम पाल को गिरफ्तार किया था।
इस तरह पूरा रैकेट करता था काम
उड़ीसा में इमली प्रसंस्करण इकाई का 11.81 करोड़ रुपये का ठेका देने के एवज में बबलू बिचौलिओं के जरिये रिश्वत की किस्त की ये रकम पंकज को पहुंचा रहा था। एफआईआर में एक और बिचौलिया गोपाल मिश्रा भी नामजद है। जांच में सामने आया कि जो भी टेंडर निकलते थे, उसकी पूरी गोपनीय जानकारी पंकज, गोपाल को देता था।गोपाल उन कंपनियों से संपर्क करता था, जो टेंडर के लिए इच्छुक होती थीं। जो कंपनी टेंडर की अपेक्षा 6-10 प्रतिशत रिश्वत देने को तैयार होती थी, उनसे वह डील फाइनल करता था। फिर उससे टेंडर संबंधी पूरी जानकारी साझा करता था। कंपनी उसी आधार पर टेंडर प्रक्रिया में शामिल होती थी। इससे उसको टेंडर मिल जाता था। इकाना इंटरप्राइज को मिले टेंडर में भी इसी तरह का खेल हुआ।
गोपाल के पास यूपी और दिल्ली की थी जिम्मेदारी
कई वर्षों से वापकोस के आरोपी अफसर रिश्वतखोरी का खेल करते आ रहे थे। अब तक करोड़ों रुपये की रिश्वत ले चुके हैं। खुद न फंसें इसलिए बिचौलियों के जरिये ही डील होती थी। जांच के मुताबिक गोपाल मिश्रा यूपी और दिल्ली की कंपनियों के ठेकेदारों से संपर्क करता था। इन दोनों प्रदेशों की जिम्मेदारी उसी के पास थी।
रिश्वत के होते थे तीन हिस्से
सीबीआई के केस में वापकोस के पंकज दुबे के अलावा भबद्युत्ती भूटिया व अभिषेक ठाकुर भी आरोपी हैं। रिश्वत की जो रकम मिलती थी, उसके बराबर के तीन हिस्से करते थे। हालांकि जांच में ये भी पता चला है कि कुछ मामलों में पंकज अधिक रकम लेता था। डील भी सबसे अधिक वही करता था, क्योंकि विभाग की अहम जिम्मेदारी उसी के पास थी। मामले में ईडी की भी इंट्री हो सकती है, क्योंकि बड़ी रकम का खेल ये गिरोह कर चुका है।

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