FIR दर्ज करने की प्रथा पर हाई कोर्ट ने खींची लकीर, चेक बाउंस विवाद में सिर्फ कोर्ट की शरण लेना होगा विकल्प
प्रयागराज: हाई कोर्ट ने परक्राम्य विलेख अधिनियम की धारा 138 (चेक बाउंस) के मामलों में एफआईआर दर्ज करने पर कड़ा रुख अपनाते हुए कहा है कि यह प्रक्रिया पूरी तरह अवैध है। ऐसे मामलों में केवल सक्षम अधिकारी की लिखित शिकायत पर ही मैजिस्ट्रेट कार्यवाही कर सकते है। कोर्ट ने कहा कि पुलिस द्वारा एफआईआर दर्ज कर चार्जशीट दाखिल करना और मैजिस्ट्रेट द्वारा यंत्रवत पारित करना आपराधिक न्याय शास्त्र के मूल सिद्धांतों का उल्लंघन है। कोर्ट ने कहा कि एफआईआर की सूचना मैजिस्ट्रेट को 24 घंटे में देना अनिवार्य है ताकि वे झूठे आरोप की जांच कर सकें।
न्यायमूर्ति विनोद दिवाकर ने बुलंदशहर निवासी सुधीर कुमार गोयल की याचिका पर यह आदेश दिया। याचिका में तर्क दिया गया कि चेक बाउंस मामले में पुलिस ने प्राथमिकी दर्ज कर चार्जशीट दायर कर दी, जबकि अधिनियम इसका प्रावधान नहीं करता। मामला तब सामने आया जब शिकायतकर्ता ने सुधीर कुमार से दो भूखंड बुक कराए थे। भुगतान के बाद भी भूखंड तीसरे पक्ष को बेच दिए गए और रिफंड के लिए जारी चारों चेक बाउंस हो गए। इसके बाद पुलिस ने एफआईआर दर्ज कर ली। कोर्ट ने इसे अवैध बताते हुए मजिस्ट्रेट का आदेश रद्द किया और नये सिरे से कानून के अनुरूप आदेश पारित करने का निर्देश दिया।
इन मामलो में नहीं हो सकती FIR
कोर्ट ने उत्तर प्रदेश पुलिस व अभियोजन निदेशालय को ऐसे 38 विशेष अधिनियमों की सूची तैयार करने का निर्देश दिया है, जिनमें पुलिस प्राथमिकी दर्ज नहीं कर सकती। इनमें घरेलू हिंसा से महिलाओं का संरक्षण अधिनियम, खान और खनिज अधिनियम् उपभोक्ता संरक्षण अधिनियम, खाद्य सुरक्षा और पर्यावरण संबंधी अधिनियम शामिल है। वहीं, एनडीपीएस ऐक्ट, शस्त्र अधिनियम, भ्रष्टाचार निवारण अधिनियम और पॉक्सो एक्ट में पुलिस को प्राथमिकी दर्ज करने का अधिकार है।

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